अंतर्राष्टीय ग्वालियर मध्य प्रदेश शिक्षा

अजय दुबे।स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर शिक्षा विभाग ने नई नीति नयी, नियत वही शिक्षा का निजीकरण समाप्त हो*

*स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर शिक्षा विभाग ने नई नीति नयी, नियत वही शिक्षा का निजीकरण समाप्त हो* *अजय दुबे की कलम से* ग्वालियर। जहां एक तरफ लॉग डाउन व कोरोना महामारी को लेकर भारत सरकार ने 29 जुलाई 2020 को 34 साल बाद एक नयी शिक्षा नीति का शुभारम्भ किया, इस नयी शिक्षा नीति ने अभी तक चली आ रही शिक्षा नीति को लगभग पूरी तरह से बदल दिया है, साथ ही यह भी कहा गया है की स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता की हर पांच वर्षो में समीक्षा की जाएगी और 2030 का लक्ष्य है की 100 प्रतिशत बच्चे स्कूल में पढ़ाई के लिए नामांकन करवाए।
इस नयी शिक्षा नीति में जो सबसे ज्यादा लोक लुभावन बाते निकली है वो ये है की अब पढ़ाई की रूप रेखा 10+2 की जगह 5+3+3+4 पर आधारित रहेगी, मतलब अब सरकारी स्कूल भी प्राइवेट की तरह ही फॉउण्डेशन, प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक की तरह पढ़ाएंगे, और विषय भी जब चाहे तब बदल सकता है।
सरकार ने नयी नीति लेकर बहुत ही महत्वपूर्ण काम किया है, और 34 साल बाद सरकार का इस तरफ ध्यानाकर्षण होना वास्तव में बहुत हर्ष का विषय है और स्वागत योग्य कदम है, इसके लिए में भारत सरकार का अभिनंदन करता हूं।
भारत सरकार ने 10वी और 12वी की बोर्ड की परीक्षाएं तो जारी रहेगी लेकिन कोचिंग कक्षाओं के व्यापर पर रोक लगाने की बात भी की है, ये अच्छा है लेकिन फिर शिक्षा के निजीकरण को रोकने के लिए कोई नीति क्यों नहीं बनायीं और न ही निशुल्क शिक्षा की कोई बात की है, इसलिए जबतक शिक्षा का निजीकरण समाप्त नहीं किया जाता है, । *नई शिक्षा नीति में शिक्षा का उद्देश्य क्या है*
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 के अनुसार, शिक्षा के व्यापक लक्ष्य हैं, जिसमे बच्चों के भीतर विचार और कर्म की स्वतंत्रता विकसित करना, दूसरों के कल्याण और उनकी भावनाओं के प्रति संवेदनशीलता पैदा करना, और बच्चों को नई परिस्थितियों के प्रति लचीले और मौलिक ढंग से ढलने में सहायक होना है, और इनके विकसित होने के बाद धन कमाना है, जिसके लिए बच्चे अपनी रूचि के अनुसार व्यवसाय करते है।
अब सोचिये अगर किसी बच्चे को पढ़ाई के समय ही धन कमाने का चस्का लग जाय तो वो अपनी जरूरतों के लिए अपने माता पिता पर निर्भर नहीं रहेगा, और उसकी जरूरते सही और गलत दोनों ही तरीके की हो सकती है, दूसरी तरफ वो शिक्षा पूरी किये बिना ही जीवन जीने की सोचने लगेगा, तीसरी सबसे बड़ी दिक्कत है, जनमानस का अति लालची होना और ये बाल श्रम को भी बढ़ावा दे सकता है, क्युकी बच्चो को 10साल की आयु में जब वो कक्षा 6 में होगा तो जीरो टेक्नोलॉजी के काम सिखाये जायेगे जैसे लकड़ी का, लोहरी का, और भी कई तरह के तो वो अपनी जेबखर्च के लिए काम करने लगेगा और फिर पढ़ाई या तो बीच में छूट जाएगी या फिर उद्देश्यहीन पढ़ाई रह जाएगी।
नयी शिक्षा पद्द्ति बजाये व्यापक उद्देश्यों के मात्र रोजगारोन्मुखी ही है, मतलब जब आप कमाने लगो शिक्षा छोड़ सकते हो, स्नातक में आपके पहले साल में कोर्स छोड़ने पर सर्टिफ़िकेट मिलेगा, दूसरे साल के बाद एडवांस सर्टिफ़िकेट मिलेगा और तीसरे साल के बाद डिग्री, और चार साल बाद की डिग्री होगी शोध के साथ, तो लोग शिक्षा पूरी करने की कम और रोजगार के अवसर खोजने में ज्यादा दिलचस्पी दिखायेंगे।
शिक्षा पद्द्ति का स्वागत इसलिए किया जा सकता है क्युकी इसमें बच्चो को भारीभरकम पढ़ाई के बोझ से छुटकारा मिल सकता है, लेकिन इसमें कही भी बच्चे के सर्वांगीय विकास और शिक्षा के निजीकरण को बंद करनी की बात सामने नहीं आयी है, जो की वास्तव में राष्ट्र और समाज के उत्थान के लिए बहुत जरुरी है, और देश के हर मतदाता को सतर्क होकर इस तरफ सरकार का ध्यान आकर्षित करवाना चाहिए।

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