अंतर्राष्टीय राजनैतिक

भोपाल । मंत्रिमंडल विस्तार : शिव के साथ संगठन भी विष पी गया…

 

भोपाल । बृजेश द्विवेदी(सम्पादक ) की कलम से ….
राजनीति और सत्ता क्या क्या नही करवाती इसके उदाहरण तो भरे पढ़े है है लेकिन मध्यप्रदेश की राजनीति में यह पहला अवसर होगा जब लोगो ने सत्ता और संगठन को इतना बेबस और लाचार देखा हो खास तौर से संघ संस्कार से पोषित भाजपा पार्टी को भाजपा ने एक बेमेल गठजोड़ को बनाए रखने के लिए जिस तरह से समझौता वादी रूख अपनाया है उसने सरकार व संगठन की दिशा को ही बदल कर रख दिया है। मंत्रिमंडल विस्तार जिस तरह से टल रहा था उसने यह संकेत तो पहले से ही दे दिए थे कि संगठन व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सिंधिया के सामने नही चल रही है। मंत्रिमंडल विस्तार से पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के इस बयान कि मंथन में निकला अमृत बटेगा ओर विष शिव पी जायँगे ने भी इस संकेत पर मुहर लगा दी थी कि इस बार उन्हें ओर संगठन को विष पीना पड़ेगा । और आज यह दिख भी गया । शिवराज मंत्री मंडल का बहुप्रतीक्षित विस्तार गुरुवार को हो गया….लेकिन इस विस्तार में जिस तरह भाजपा संगठन ओर मुख्यमंत्री लाचार नजर आये उसने कम से कम भाजपा के देव दुर्लभ कार्यकर्ताओ को तो अच्छा संदेश नही दिया है… यह सही है कि श्रीमंत के कारण भाजपा फिर प्रदेश की सत्ता में फिर काबिज होने में सफल हुई है उनका सम्मान भाजपा को रखना होगा लेकिन संगठन को अपना घर भी तो देखना जरूरी है जिस अनुशासन और सिद्धांतो के कारण यह घर आज पंच की भूमिका तक पहुंच सका उसको तो दांव पर नही लगाया जा सकता …जो लाखो लाख भाजपा कार्यकतार्ओं की निष्ठा के कारण आज भाजपा इस ऊँचाई पर पहुची है उसका मान रखना संगठन की पहली प्राथमिकता होनी थी । मंत्री मंडल विस्तार को अगर ग्वालियर चंबल अंचल का विस्तार कहे तो ज्यादा ठीक होगा…कुल 28 सदस्यों के मंत्रिमंडल में यहां से सिंधिया सार्थक 11 लोग मंत्री बनाय गए है जिसमे 10 ग्वालियर चंबल अंचल से आते है ।भाजपा के भी जोड़ ले तो यह संख्या 13 तक पहुचती है। कांग्रेस की सरकार में सिंधिया के कुल 6 समर्थक मंत्री थे। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने समर्थकों के लिए जो किया वह उनके हिसाब से ठीक ओर उचित माना जा सकता है लेकिन अगर भाजपा की दृष्टि से देखा जाय तो आगे केवल नुकसान ही दिखता है। मंत्री मंडल विस्तार में सिंधिया जी की हठ सबने देखी लेकिन यह सब यही खत्म नही होगा उसके बाद विभागों के बंटवारे में हठ देखने को मिलेगी और फिर उसके बाद सरकार के फैसलों पर उनका सीधा हस्ताक्षेप होगा यह भी तय है। मंत्री मंडल में उनके कुल12 समर्थक मंत्री है सवाल यह है भी है कि वह मुख्यमंत्री की सुनेंगे की अपने सिंधिया जी की। ऐसी स्थति में सरकार कैसे चलेगी यह समझा जा सकता है। यह तो रही सरकार की बात संगठन को कितने मोर्चो पर लड़ना पड़ेगा इसका भाजपा के वरिष्ठ नेताओं को भी अंदाजा है। 24 सीट जहाँ उपचुनाव होने है उसमें 16 सीटे ग्वालियर चंबल अंचल की है। इस क्षेत्र में जो भाजपा नेता है वह आज तक कांग्रेस के खिलाफ लड़कर राजनीति करते आये है क्या वह कांग्रेस से भाजपा में आये सिंधिया समर्थकों को जिताने के काम करेंगे…सम्भव ही नही है क्योंकि सिंधिया समर्थक की जीत उनके राजनेतिक जीवन का ही अंत कर देगी। यही कारण है कि भाजपा को इस बार भीतरघात की इतनी विकराल आपदा देखने को मिल सकती है जिसकी उसको कल्पना भी नही हो । उमा भारती जैसी कद्दावर नेता की खुलकर नाराजगी और इंदौर में भाजपा नेताओ के प्रदर्शन ने संगठन को संकेत दे दिए है कि आगे की राह कठिन है। संगठन अगर डैमेज कंट्रोल में सफल नही होता है तो ग्वालियर चंबल अंचल में तो संगठन स्तर का तानाबाना छिन्न्न भिन्न होने की प्रबल संभावना है। भाजपा इस लिए भी बड़े घाटे में रह सकती है क्यों राजनेतिक विश्लेषकों का कहना है कि सिंधिया का जिस तरह का व्यक्तित्व है वो भाजपा जैसी कैडर बेस पार्टी के नियम और सिद्धांतों से बिल्कुल मेल नही खाता है। मंत्रिमंडल विस्तार में जिस तरह उन्होंने जिद कर अपनी बातें मनवाई उसने यह संकेत दे दिए है कि भाजपा में आने के बाद भी वह व्यवाहर से कांग्रेसी ही है…इसका मतलब तो यही है कि अगर सिंधिया अपना व्यवाहर नही बदलते है तो यह बेमेल गठजोड़ ज्यादा दिनों तक नही चलने वाला है। भाजपा फिलहाल मजबूर है इसलिए कुछ समय यह गठजोड़ चल जाये आगे सिंधिया में बदलाव नही आया तो गठजोड़ टूटना पक्का है। कुल मिलाकर देखा जाय तो प्रदेश की सत्ता में फिर काबिज हुई भाजपा और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लिए इतनी मजबूरी ओर असहाय की स्थति पहले कभी भी देखी नही गई। संगठन की मजबूरी ने एक ऐसे मंत्रिमंडल को सामने लाया है जिसमे संतुलन नाम की कोई सोच ही नही है। विंध्य में 24 सीट जीतने वाली भाजपा ने इस क्षेत्र से केवल एक ही मंत्री बनाया है। इस निर्णय को लेकर विंध्य की जनता विशेषकर ब्राह्मण नाराज हैं। यह कहना गलत नहीं होगा की विंध्य की राजनीति में ब्राह्मण अति महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में ब्राह्मण को पूरी तरह से नकारना भाजपा को महंगा पड़ सकता है। आगामी नगरीय निकाय चुनाव में इसकी झलक देखने को मिल सकती है। महाकौशल क्षेत्र से केवल एक ही मंत्री बनाना भी भाजपा के लिए शुभ संकेत नहीं दे रहा है। पूर्व मंत्री संजय पाठक का दबदबा मैहर से लेकर जबलपुर तक और पन्ना से लेकर दमोह तक माना जाता है। इसके अलावा यहां की कई सीटों में ब्राह्मण वर्ग को विजय फैक्टर माना जाता है। हो सकता है कि इन सब समीकरणो का कुछ विशलेषक यह कह कर खारिज कर दे कि यह सब फैसले परिस्थितियो के कारण संगठन को लेने पड़े आगे सब ठीक हो जायेगा लेकिन यह तर्क भाजपा के लाखो लाख कार्यकर्ताओ को कैसे संतुष्ट करेगा जिन्होने पार्टी सिद्धातो से समझौता नही करने पर केवल एक वोट केन्द्र की अटल बिहारी सरकार को गिरते देखा है ।

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