अंतर्राष्टीय

कार्यक्रम शख्सियत में जाने साहित्यक और काव्य पाठ के क्षेत्र में उभरते हुए युवा कवि गोपाल पाठक को ।

हिंदी साहित्य काव्य पाठ के क्षेत्र में उभरते कवि कृष्णा उर्फ गोपाल पाठक आज किसी पहचान के मोहताज नहीं है युवा कवि मीर गंज बरेली उतरप्रदेश निवासी गोपाल पाठक द्वारा कम समय में अपनी पहचान बना कर साहित्यक क्षेत्र में नाम रोशन किया है । देश के कोने कोने में इनके द्वारा कई कार्यक्रम किये जाते है  ।                                       सम्मान –    इनको गांधी इंटरनेशनल पीस अवार्ड (2019) काठमान्डु , आजाद परिंदे साहित्यक सम्मान (2019) वैशाली साहित्यक सम्मान (2018) वैशाली बिहार , काव्य पुरोधा बाराबंकी , जैसे कई सम्मानों सुशोभित  किया गया है ।                          पुस्तकें – प्रकाशित पुस्तक .हम सफर (2017)  एवम आने वाली पुस्तक ..में फना हो जाऊंगा (2020) प्रकाशित होने वाली है
अभी फिलहाल में “श्रीमद्भागवत गीता” को “गोपाल गीता” के नाम से खंड काव्य और “गांधार नरेश” महाकाव्य शकुनि पर लिख रहे हैं।इसके अलावा  कई एल्बम में गीत भी लिखे हैं

हम इनकी  कविताओं के कुछ अंश प्रस्तुत कर रहे है ॥  किसी के पांव में ये कर्म की जंजीर है।
जी लिया जीभर यहां जो वो ही सच्चा वीर है।।

सांस जैसा चलते रहना जिंदगी का गीत है।
छोड़ दे सबकुछ प्रभु पर व्यर्थ ही भयभीत है।।

पी लिया जिसने हलाहल जी लिया संसार को।
मीत वो ही है प्रभु का बांटता है प्यार जो।।

क्या मिला क्या रह गया सब छोड़ तू मलाल दे।
भगवान को धारा समझ के नाव अपनी डाल दे।।

पतवार कर्मों को समझ और सिंधु को संसार तू।
राम को दिल में बसाकर करले भव को पार तू।।

दिख रहा चहुं ओर जो कुछ राम का विस्तार है।
इसलिए ही विश्व से हमको सदा से प्यार है।।

पा लिया जो धन अगर किस बात का अभिमान है।
छोड़ना सबकुछ पड़ेगा क्यो नहीं ये भान है।।

प्रस्तुत पंक्तियां #गांधार_नरेश(खंडकाव्य) प्रथम सर्ग से ली गई हैं।

अक्षोंनियों सेना खड़ी है युद्ध के उन्माद में।
दिख रहे हर ओर योद्धा शस्त्र लेकर हाथ में।।

कोई पैदल,कोई घोड़ा,कोई रथ पर चढ रहा।
युद्ध की आज्ञा मिले हर वीर मुख से कह रहा।।

जीत से आश्वस्त कौरव चूर हैं अभिमान में।
भीष्म हैं तो कौन जीतेगा हमें संग्राम में।।

इस कुरु सेना की द्रोणाचार्य दीवार हैं।
इन्द्र भी न लड़ सके जो हाथ में हथियार हैं।।

इस भरी सेना के बीचों बीच अर्जुन आ गया।
भीष्म औे गुरु को निरख कर पार्थ कुछ सकुचा गया।।

आ गई है याद बचपन में पितामह प्यार की।
द्रोण से सीखे चलाना तीर की तलवार की।।

सोचकर फिर साथ से ये गिर गया गांडीव है।
कृष्ण एकदम कह उठे तबीयत तुम्हारी ठीक है।।

क्या हुआ हे पार्थ बोलो ये धनुष क्यों गिर गया।
इतना बता अर्जुन मुझे किस बात से तू डर गया।।

पैर स्थिर हैं नहीं और हाथ तेरे कांपते।
कौन सी पीढ़ा है दिल में बोल दे तू बोल दे।।

पार्थ बोला क्या लड़ूं हर ओर अपना दिख रहा।
युद्ध बाहर क्या करू मैं युद्ध खुद से कर रहा।।

काट दूं बाहें वो कैसे जिनने झुलाया था कभी।
कैसे विरुद्ध उनके लड़ूं जिनने सिखाया था कभी।।

मारना इनको पड़े न स्वप्न ऐसा चाहिए।
सत्य कहता हूं कभी न राज्य ऐसा चाहिए।।

क्या समंदर से कभी कोई झगड़ती धार है।
स्वयं पर भी जुल्म करना एक अत्याचार है।।

दादा गुरु के सामने न मै खड़ा हो पाऊंगा।
माफ़ मधुसूदन करो मै युद्ध न कर पाऊंगा।।

कृष्ण बोले क्या हुआ किस बात का बैराग है।
क्यों अभी से हरता है ये तो बस शुरुआत है।।

इस तरह अर्जुन तुझे तो यश नहीं मिल पाएगा।
न धर्म क्षत्री का तेरे ये पूर्ण ही हो पाएगा।।

इस तरह तो और भी मिल जाएगा अपयश तुझे।
इस लोक न सुख मिले न स्वर्ग का ही सुख तुझे।।

पार्थ तुम बलबीर हो,रणधीर हो,रणवीर हो।
तुम नहीं योद्धा हो वो जो युद्ध से भयभीत हो।।

तुम जो चाहो तो हिला सकते हो इस संसार को।
तुम जो चाहो तो बदल सकते नदी की धार को।।

मै जानता हूं जल को थल केवल बना सकते हो तुम।
मै जानता हूं वाण पर पृथ्वी उठा सकते हो तुम।।

बस तुम्हारे वास्ते ये युद्ध ही आधार है।
अब किसी का शोक करना युद्ध में बेकार है।।

कवि गोपाल पाठक “कृष्णा”
बरेली,उप्र
8279648462

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