शिक्षा

संजय पाठक । आठवीं तक फेल न करने की नीति में बदलाव को राज्यसभा ने दी मंजूरी*

विशेष –
1-नहीं पढ़े तो होंगे फेल: आठवीं तक फेल न करने की नीति में बदलाव को राज्यसभा ने दी मंजूरी

2-स्कूलों में अब पहली से आठवीं तक छात्रों को फेल भी किया जाएगा। लोकसभा में पिछले साल ही पारित हो चुका है विधेयक।…
*नई दिल्ली* -स्कूली शिक्षा के सुधार में तेजी से जुटी सरकार के रास्ते का एक बड़ा रोड़ा फिलहाल हट गया है। स्कूलों में आठवीं तक फेल न करने की नीति में बदलाव को गुरूवार को राज्यसभा ने भी मंजूरी दे दी है। इसके तहत स्कूलों में अब पहली से आठवीं तक छात्रों को फेल भी किया जाएगा। हालांकि उन्हें इससे पहले पास होने का एक मौका दिया जाएगा। जिसके तहत मुख्य परीक्षा के दो महीने के भीतर ही दूसरी बार फिर परीक्षा ली जाएगी। लोकसभा में इस विधेयक को पिछले साल ही मंजूरी मिल चुकी है। ऐसे में अब इस विधेयक पर अमल का रास्ता साफ हो गया है।

राज्यसभा में निशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार विधेयक- 2018 को पेश करते हुए केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडेकर ने स्कूली शिक्षा को मजबूत बनाने के लिए इस बदलाव को जरूरी बताया। साथ ही कहा कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार भी होगा।

उन्होंने इस दौरान चर्चा में कांग्रेस सहित दूसरे दलों के सदस्यों की ओर से उठाए गई आशंकाओं को भी साफ किया। साथ ही कहा कि इस बदलाव का मतलब यह कतई नहीं है कि किसी को स्कूल से निकाला जा रहा है। जावडेकर ने कहा कि यह बदलाव अभिभावकों की मांग के बाद भी किया गया है। इस चर्चा में सभी दलों के सदस्यों ने हिस्सा लिया।

25 राज्य थे बदलाव के पक्ष में

मानव संसाधन विकास मंत्रालय की मानें तो इस बदलाव के बाद स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार आएगा। क्योंकि मौजूदा समय में आठवीं तक छात्रों को फेल न करने की नीति से शैक्षणिक गुणवत्ता में पहले के मुकाबले गिरावट आई है। कैब (सेंट्रल एडवाइजरी बोर्ड ऑफ एजुकेशन) की बैठक में रखे गए इस प्रस्ताव को 25 राज्यों ने अपनी सहमति दी थी, हालांकि चार राज्यों इस बदलाव के खिलाफ है, इनमें आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, उड़ीसा और तेलंगाना शामिल है।

राज्यों को दी है पूरी स्वायत्तता

चार राज्यों के विरोध को देखते हुए सरकार ने फेल न करने की नीति में बदलाव को लेकर राज्यों को पूर्ण स्वायत्ता भी दी है। इसके तहत यदि कोई राज्य इससे सहमत नहीं है, तो अपने लिहाज से परीक्षा कराने या न कराने का फैसला ले सकते है।

.इसलिए लिया गया था फेल न करने का फैसला

स्कूलों में आठवीं तक फेल न करने की नीति यूपीए सरकार के दौरान बच्चों के स्कूल छोड़ने की बढ़ती संख्या को देखते हुए लिया गया था। इसके चलते प्रत्येक छात्र आठवीं तक पास होता चला जाता है, जबकि नौवीं में वह फेल हो जाता है। ऐसे में नौवीं में अचानक छात्रों के फेल होने की संख्या बढ़ गई थी। हालांकि सरकार का दावा है कि इसके चलते स्कूल मिड-डे मील सेंटर के रूप में तब्दील होकर रह गए थे।

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